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Wednesday, September 23, 2015
सिपाही की माँ...वीड़ियो
St.George Mount Hs, Kaipattoor School located in Vallicode, Vallikodu, Konni - Pathanamthitta നിര്മ്മിച്ച് യൂ-ട്യൂബില് അപ്ലോഡ് ചെയ്തിട്ടുള്ള മനോഹരമായ വീഡിയോ. ഇത് ബ്ലോഗില് പ്രസിദ്ധീകരിക്കാനുള്ള അനുവാദം ചോദിച്ച് കഴിഞ്ഞ വര്ഷം തന്നെ സ്കൂള് വിലാസത്തിലേയ്ക്ക് മെയില് ചെയ്തിരുന്നു. മറുപടി കിട്ടിയില്ല. യൂ-ട്യൂബില് പൊതുവായി അപ്ലോഡ് ചെയ്തിട്ടുള്ള വീഡിയോ ആയതിനാല് അതിന്റെ ലിങ്ക് ഏവര്ക്കും പ്രയോജനപ്പെടുമെന്ന പ്രതീക്ഷയില് ഇവിടെ നല്കുന്നു. (വിദ്യാഭ്യാസ ആവശ്യത്തിനായി മാത്രമാണ് ഈ ലിങ്ക് ഇവിടെ നല്കുന്നത്. ആര്ക്കെങ്കിലും ഇതില് എതിര്പ്പുള്ള പക്ഷം അറിയിച്ചാല് ഈ പോസ്റ്റ് ഒഴിവാക്കുന്നതാണ്)
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नवीं कक्षा
Friday, July 20, 2012
खेती नहीं करनेवाला किसान
खेती नहीं करनेवला किसान केलिए एक सामग्री
प्रवेश कार्य में इसका प्रयोग कर सकते हैं।
कविता का वीड़ियो भी यहाँ उपलब्ध है।
विचार है कि कविता सुनाने के बाद प्रशनों के सहारे खेती नहीं करनेवला किसान कविता की समस्या पर पहुँच सकते हैं।
प्रवेश कार्य में इसका प्रयोग कर सकते हैं।
कविता का वीड़ियो भी यहाँ उपलब्ध है।
विचार है कि कविता सुनाने के बाद प्रशनों के सहारे खेती नहीं करनेवला किसान कविता की समस्या पर पहुँच सकते हैं।
Sunday, September 04, 2011
डाक्टर बी.आर,अम्बेड्कर के जीवन पर आधारित वृत्तचित्र
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उदघोषणा,
नवीं कक्षा
Sunday, August 28, 2011
पुनःप्रकाशन - हिरोशिमा कविता का दृश्य रूप
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उदघोषणा,
नवीं कक्षा
Sunday, March 06, 2011
जल जीवन है!-एक सहायक सामग्री(कन्नूर से रविजी)
Sunday, February 27, 2011
ईचक दाना बीचक दाना...
Tuesday, February 15, 2011
पारस पत्थर
संस्कृत : "स्पर्श मणि"
English: Philosopher's Stone
पारस पत्थर एक पहेली है। आज तक इस रहस्य को कोइ नहि जान पाया और जिसने जाना अब वह इस दुनिया मे नहि है परन्तु कह्ते है कि पारस कि खोज अब तक जारी है।एटॉमिक संरचना की मानी जाये तो कोई ऐसा पारस पत्थर नहीं होता है जो लोहे को सोना बना दे। यह काले रंग का सुगन्धित पत्थर है तथा यह दुर्लभ व बहुमूल्य होता है।
पारस पत्थर के बारे मे यह मान्यता है कि लोहे को इस पत्थर से स्पर्श कराने पर लोहा सोना बन जाता है।
किंवदंती के अनुसार, 13 वीं सदी के वैज्ञानिक और दार्शनिक Albertus Manus ने पारस पत्थर की खोज की थी।
गुड़ (शक्कर)
उपयोग
गुड़ उपयोगी खाद्य पदार्थ माना जाता है। इसका उपयोग भारत में अति प्राचीन काल से होता आ रहा है। भारत की साधारण जनता इसका व्यापक रूप में उपयोग करती है तथा यह भोजन का एक आवश्यक व्यंजन है। इसमें कुछ ऐसे पौष्टिक तत्व विद्यमान रहते हैं जो चीनी में नहीं रहते। स्वच्छ चीनी में केवल चीनी ही रहती हैं, पर गुड़ में 90 प्रतिशत के लगभग ही चीनी रहती है। शेष में ग्लूकोज, खनिज पदार्थ, विटामिन आदि स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयोगी पदार्थ भी रहते हैं। आयुर्वेदिक दवाओं तथा भोज्य पदार्थों में विभिन्न रूपों में इसका उपयोग होता है।
बरगद
बरगद बहुवर्षीय विशाल वृक्ष है। यह एक स्थलीय द्विबीजपत्री एंव सपुष्पक वृक्ष है। इसका तना सीधा एंव कठोर होता है। इसकी शाखाओं से जड़े निकलकर हवा में लटकती हैं तथा बढ़ते हुए जमीन के अंदर घुस जाती हैं एंव स्तंभ बन जाती हैं। इन जड़ों को बरोह या प्राप जड़ कहते हैं। इसका फल छोटा गोलाकार एंव लाल रंग का होता है। इसके अन्दर बीज पाया जाता है। इसका बीज बहुत छोटा होता है किन्तु इसका पेड़ बहुत विशाल होता है। इसकी पत्ती चौड़ी, एंव लगभग अण्डाकार होती है। इसकी पत्ती, शाखाओं एंव कलिकाओं को तोड़ने से दूध जैसा रस निकलता है जिसे लेटेक्स कहा जाता है।
बेर(शब्द परिचय-हमारे गाँव की आखिरी बारिश)
Friday, February 11, 2011
जल जीवन है!-एक सहायक सामग्री
इसका वीडियो रूप (मलयालम ) वीडियो पन्ने में....
Saturday, February 05, 2011
जल-संरक्षण के लिए समाज आगे आये(ज्ञानेंद्र/राज एक्सप्रेस)
सेव वाटर, सेव लाइफजल संकट देश ही नहीं, समूचे विश्व की गंभीर समस्या है। दुनिया के विशेषज्ञों की राय है कि वर्षा जल संरक्षण को बढावा देकर गिरते भू-जल स्तर को रोका जा सकता है। टिकाऊ विकास का यही आधार हो सकता है। इसमे दो राय नहीं कि जल संकट ही आने वाले समय की सबसे बडी चुनौती है, जिस पर गौर करना आज की सबसे बडी जरूरत है। वरना, स्थिति इतनी भयावह होगी कि उसका मुकाबला कर पाना असंभव होगा। लिहाजा, जल-प्रबंधन पर ध्यान दिया जाना बेहद जरूरी है। Tuesday, January 25, 2011
नर्मदा बचाओ आन्दोलन पर एक फोटो फीचर
नर्मदा - मध्यभारत की जीवन रेखा-(साभार – नर्मदा समग्र)
(नवीं कक्षा के हमारे गाँव की आखिरी बारिश केलिए अधिक सामग्री)
नर्मदानर्मदानर्मदा मध्य भारत के मध्य प्रदेश और गुजरात राज्य में बहने वाली एक प्रमुख नदी है। अमृतमयी पुण्य सलिला नर्मदा की गणना देश की प्रमुख नदियों में की जाती है। पवित्रता में इसका स्थान गंगा के तुरन्त बाद है कहा जो यह जाता है कि गंगा में स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है वह नर्मदा के दर्शन मात्र से ही प्राप्त हो जाता है।
यदि हम तर्क की नाव पर सवार हों तो नर्मदा मध्यप्रदेश के शहडोल जिल में अमरकंटक नामक स्थान से निकलने वाली एक बारहमासी नदी है जो पश्चिम की ओर बहती हुई गुजरात राज्य में जाकर खम्बात की खाडी में समुद्र में विलीन हो जाती है। सतपुडा और विंध्याचल की पर्वत श्रेणियों के संधि स्थल पर एक छोटे से कुंड के रूप में अवतरित इस नदी का स्वरूप यात्रा के अंत में समुद्र से मिलन के समय घाट लगभग 24 किलोमीटर हो जाता है, परन्तु यह भी सत्य है कि हमारे देश में नदियों को केवल बहते हुये जल के रूप में ही नहीं देखा जाता है। वे जीवनदायिनी मां के रूप में पूज्य होती है। नर्मदा में भी अपार आस्था समाई हुई है। इसे ’मइया‘ और देवी होने का गौरव प्राप्त है। पुरातन काल से ऋषि मुनियों की तपस्या स्थली रही नर्मदा आज भी धार्मिक अनुष्ठानों का गढ है। पूरे देश म यही एक मात्र ऐसी नदी है कि जिसकी परिक्रमा की जाती है। मन में अपार श्रद्धा लिये हुये सैकडों पदयात्री पैरों के छालों की परवाह किए बगैर 2600 कि.मी. की यात्रा में 3 वर्ष 3 महीने और 13 में पूरी करके अपने जीवन को धन्य मानते हैं।
नर्मदा के किनारे सैकडों तीर्थस्थल और मंदिर तो हैं ही साथ ही अनेक स्थानों पर इसका सदर्य देखते ही बनता है। असंख्या जडी बूटियों और वृक्षों के बीच से बहती हुई नर्मदा को मध्यप्रदेश की जीवन रेखा भी कहा जाता है। सैकडों छोटी-मोटी नदियों को अपने में समेटती हुई यह नदी कमी इठलाती हुई चलती है, कभी शांत बहती है तो कभी सहस्त्र धाराओं में विभाजित हो जाती है। संगमरमरी दूधिया चट्टानों को चीर कर इसको बहता देख दर्शक को अलौकिक सुख की प्राप्ति होती है। नर्मदा को निर्मल जल में स्नान से जो सुख प्राप्त होता है वह अवर्णनीय है। आराम देती है इसी से इसका नाम ’नर्मदा‘है और चुलबुली शरारती भी है और इसी कारण इसे ’रेवा‘ कहा गया है।
पुराणों में नर्मदा को शंकर जी की पुत्री कहा गया है, इसका प्रत्येक कंकर शंकर माना जाता है। जन मानस ने इसे ’मइया‘का गौरव दिया है। ’देवी‘ मानकर पूजा है। अपनी हजारों मन्नते पूरी की हैं। नर्मदा ने भी अनादि काल से अनगिनत रेखों को सींचा है। करोडों प्यासों की प्यास बुझाई है। आस्था के समुद्र में गोते लगाकर जिसने जो मांगा है उसे निराश नहीं किया है। पर आइए हम भी जरा सोचें कि हमने अपनी ’मां‘के लिए क्या किया है क्या हमारा कोई कर्तव्य नहीं है अपनी नर्मदा ’मइया‘ के प्रति मात्र पवित्रता करने से या स्तुतिगान से काम नहीं चलता। सेवा भाव से इसकी परिक्रमा को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए हम सबको जागरूक रहकर इसके संरक्षण के लिए प्रयास करना होगा ताकि आने वाली पीढियां भी लाभान्वित हो सके।
Friday, January 14, 2011
प्रेमचंद का गोदान(आभार-हिंदी कुंज)
Sunday, January 09, 2011
शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय
प्रमुख कृतियाँ
शरत्चंद्र ने अनेक उपन्यास लिखे जिनमें पंडित मोशाय, बैकुंठेर बिल, मेज दीदी, दर्पचूर्ण, श्रीकांत, अरक्षणीया, निष्कृति, मामलार फल, गृहदाह, शेष प्रश्न, दत्ता, देवदास, बाम्हन की लड़की, विप्रदास, देना पावना आदि प्रमुख हैं। बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन को लेकर "पथेर दावी" उपन्यास लिखा गया। पहले यह "बंग वाणी" में धारावाहिक रूप से निकाला, फिर पुस्तकाकार छपा तो तीन हजार का संस्करण तीन महीने में समाप्त हो गया। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने इसे जब्त कर लिया। शरत के उपन्यासों के कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुए हैं। कहा जाता है कि उनके पुरुष पात्रों से उनकी नायिकाएँ अधिक बलिष्ठ हैं। शरत्चंद्र की जनप्रियता उनकी कलात्मक रचना और नपे तुले शब्दों या जीवन से ओतप्रोत घटनावलियों के कारण नहीं है बल्कि उनके उपन्यासों में नारी जिस प्रकार परंपरागत बंधनों से छटपटाती दृष्टिगोचर होती है, जिस प्रकार पुरुष और स्त्री के संबंधों को एक नए आधार पर स्थापित करने के लिए पक्ष प्रस्तुत किया गया है, उसी से शरत् को जनप्रियता मिली। उनकी रचना हृदय को बहुत अधिक स्पर्श करती है। पर शरत्साहित्य में हृदय के सारे तत्व होने पर भी उसमें समाज के संघर्ष, शोषण आदि पर कम प्रकाश पड़ता है। पल्ली समाज में समाज का चित्र कुछ कुछ सामने आता है। महेश आदि कुछ कहानियों में शोषण का प्रश्न उभरकर आता है। उनके कुछ उपन्यासों पर आधारित हिन्दी फिल्में भी कई बार बनी हैं।
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Thursday, December 23, 2010
हिंदी की बोलियाँ
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Tuesday, December 21, 2010
ईष़व मेम्मोरियल
नवीं कक्षा के प्रश्न-केरल के दलित मुक्ति केलिए सहायक बने आन्दोलनों पर निबन्ध तैयार करें -केलिए सहायक सामग्री(भाग-4)
तिरुवितांरूर की आबादी मे 1/5 ईष़व जाति के थे। पर सरकारी कामों में उनको बहुत कम प्रतिनिधित्व मिलते थे।शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में ईष़व लोगों को भी महत्व मांगते हुए 13,176 लोगों से हतस्ताक्षरित एक बड़ी अर्जी 1896 सितंबर ३ को महाराजा के समक्ष पेश किया गया। यह अर्जी ईष़व मेम्मोरियल नाम से प्रसिद्ध है। इसके नेता डॉ.पल्पु थे।
तिरुवितांरूर की आबादी मे 1/5 ईष़व जाति के थे। पर सरकारी कामों में उनको बहुत कम प्रतिनिधित्व मिलते थे।शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में ईष़व लोगों को भी महत्व मांगते हुए 13,176 लोगों से हतस्ताक्षरित एक बड़ी अर्जी 1896 सितंबर ३ को महाराजा के समक्ष पेश किया गया। यह अर्जी ईष़व मेम्मोरियल नाम से प्रसिद्ध है। इसके नेता डॉ.पल्पु थे।
मलयाली मेम्मोरियल
नवीं कक्षा के प्रश्न-केरल के दलित मुक्ति केलिए सहायक बने आन्दोलनों पर निबन्ध तैयार करें -केलिए सहायक सामग्री(भाग-5)
तिरुवितांकूर उच्च सरकारी पदों में तमिल ब्राह्मण लोग काम करते थे।"तिरुवितांकूर तिरुवितांकूर के लोगों केलिए" नारा लगाकर दस हजार लोगों से हतस्ताक्षरित एक बड़ी अर्जी महाराजा श्रीमूलम तिरुनाल के समक्ष, 1891 में पेश किया।यह है मलयाली मेम्मोरियल।इसके नेता जी.पी.पिल्ला और के.पी.शंकरमेनोन थे।
तिरुवितांकूर उच्च सरकारी पदों में तमिल ब्राह्मण लोग काम करते थे।"तिरुवितांकूर तिरुवितांकूर के लोगों केलिए" नारा लगाकर दस हजार लोगों से हतस्ताक्षरित एक बड़ी अर्जी महाराजा श्रीमूलम तिरुनाल के समक्ष, 1891 में पेश किया।यह है मलयाली मेम्मोरियल।इसके नेता जी.पी.पिल्ला और के.पी.शंकरमेनोन थे।
कल्पात्ती-शुचीन्द्रम सत्याग्रह
नवीं कक्षा के प्रश्न-केरल के दलित मुक्ति केलिए सहायक बने आन्दोलनों पर निबन्ध तैयार करें -केलिए सहायक सामग्री(भाग-3)
पालक्काडु जिले के कल्पात्ती शिवमंदिर रथोत्सव केलिए प्रसिद्ध है। पुराने ज़माने में मंदिर और उसके चारों ओर के रास्ते अवर्ण हिंदुओं केलिए निषिध थे।पर उल्लेख की बात यह है कि ईसाई और इस्लां धर्म के लोंगों को इसी रास्ते से चलने में कोई बाधा नहीं थी। गुरुवायूर सत्याग्रह से उत्तेजित अवर्ण जाति के युवकों ने रथोत्सव देखने केलिए मंदिर के बाहर के रास्ते में जबरदस्त प्रवेश किया।यह संघर्ष का कारण बन गया।कुछ लोग जाति और नाम बदलकर वही रास्ते से चलने लगे।इससे सवर्ण और ब्राह्णण लोग लज्जित हुए।१९२६ को डा.नायडू के नेतृत्व में एक सत्याग्रह शुरू किया।सत्याग्रह पराजय था। बाद में हाईकोर्ट में दी गई अर्जी पर आई आदेशानुसार शुचीन्द्रम मंदिर के रास्ते अवर्णों केलिए खुले।
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| शुचीन्द्रम |
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| कल्पात्ती |
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