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Wednesday, September 23, 2015

सिपाही की माँ...वीड़ियो

St.George Mount Hs, Kaipattoor School located in Vallicode, Vallikodu, Konni - Pathanamthitta നിര്‍മ്മിച്ച് യൂ-ട്യൂബില്‍ അപ്‍ലോഡ് ചെയ്തിട്ടുള്ള മനോഹരമായ വീഡിയോ. ഇത് ബ്ലോഗില്‍ പ്രസിദ്ധീകരിക്കാനുള്ള അനുവാദം ചോദിച്ച് കഴിഞ്ഞ വര്‍ഷം തന്നെ സ്കൂള്‍ വിലാസത്തിലേയ്ക്ക് മെയില്‍ ചെയ്തിരുന്നു. മറുപടി കിട്ടിയില്ല. യൂ-ട്യൂബില്‍ പൊതുവായി അപ്‍ലോഡ് ചെയ്തിട്ടുള്ള വീഡിയോ ആയതിനാല്‍ അതിന്റെ ലിങ്ക് ഏവര്‍ക്കും പ്രയോജനപ്പെടുമെന്ന പ്രതീക്ഷയില്‍ ഇവിടെ നല്കുന്നു. (വിദ്യാഭ്യാസ ആവശ്യത്തിനായി മാത്രമാണ് ഈ ലിങ്ക് ഇവിടെ നല്കുന്നത്. ആര്‍ക്കെങ്കിലും ഇതില്‍ എതിര്‍പ്പുള്ള പക്ഷം അറിയിച്ചാല്‍ ഈ പോസ്റ്റ് ഒഴിവാക്കുന്നതാണ്)

Friday, July 20, 2012

खेती नहीं करनेवाला किसान

खेती नहीं करनेवला किसान केलिए एक सामग्री
प्रवेश कार्य  में इसका प्रयोग कर सकते हैं।
कविता का वीड़ियो भी यहाँ उपलब्ध है।
विचार है कि कविता सुनाने के बाद प्रशनों के सहारे खेती नहीं करनेवला किसान कविता की समस्या पर पहुँच सकते हैं।
ഇതു പാടമല്ലെന്റെ ഹൃദയമാണ് …
നെല്കതിരല്ല കരിയുന്ന മോഹമാണ്..ഇനിയെന്റെ കരളും പറിച്ചു കൊള്‍ക..
പുഴയല്ല കണ്ണീരിനുറവയാണ് …വറ്റി വരളുന്നതുയിരിന്റെ ഉറവയാണ്
ഇനിയെന്റെ ശാന്തിയുമെടുത്തു കൊള്‍ക
കിളിയകട്ടാന്‍ കടും താളമില്ല 
നുരിയിട്ടു നിവരുന്ന ചെറുമി തന്‍ ചുണ്ടില്‍ വയല്‍ പാട്ടു ചാര്‍ത്തും ചുവപ്പുമില്ല
നാമ്പുകളുണങിയ നുകപ്പാടിനോരത്ത് നോക്കുകുത്തി പലക ബാക്കിയായികതിരു കൊത്താന്‍ കൂട്ടുകിളികളില്ല
ഇനിയെന്റെഇനിയെന്റെഇനിയെന്റെ ചലനവുമെടുത്തു കൊള്‍ക… ബോധവുമെടുത്തു കൊള്‍ക……………………. പാട്ടുകളെടുത്തു കൊള്‍ക…………
കര്‍ക്കിട കൂട്ടങ്ങള്‍ മേയുന്ന മടവകള്‍

വയല്‍ ചിപ്പി ചിത്രം വരക്കും ചതുപ്പുകള്‍
മാനത്തു കണ്ണികള്‍ മാരശരമെയ്യുന്ന മാനസ സരസ്സാം ജലചെപ്പുകള്‍
ധ്യാനിച്ചു നില്‍കുന്ന ശ്വേത സന്യാസികള്‍…..
നാണിച്ചു നില്ക്കും കുളക്കോഴികള്‍ …
പോയ്മറഞെങൊ വിളക്കാല ഭംഗികള്‍ …

വറുതി കത്തുന്നു കറുക്കുന്നു ചിന്തകള്‍
ഇനിയെന്റെ ബോധവുമെടുത്തു കൊള്‍ക…………………….
വൈക്കോല്‍ മിനാരം മറഞ്ഞ മുറ്റത്തിന്നു

ചെണ്ട കൊട്ടി കടത്തെയ്യങ്ങളാടുന്നു
ഇനിയെന്റെ ചലനവുമെടുത്തു കൊള്‍ക…
ഇനിയെന്റെ ശാന്തിയുമെടുത്തു കൊള്‍ക
ഇനിയെന്റെ കരളും പറിച്ചു കൊള്‍ക…
ഇനിയെന്റെ പാട്ടുകളെടുത്തു കൊള്‍ക…………
ഇനിയെന്റെ ബോധവുമെടുത്തു കൊള്‍ക…………………….

( ഒരു കര്‍ഷകന്റെ ആത്മഹത്യക്കുറിപ്പ് - മുരുകന്‍ കാട്ടാക്കട )


Sunday, September 04, 2011

डाक्टर बी.आर,अम्बेड्कर के जीवन पर आधारित वृत्तचित्र

डाक्टर भीमराव रामजी आंबेडकर ( १४ अप्रैल , १८९१ -- ६ दिसंबर , १९५६ ) एक भारतीय विधिवेत्ता थे। वे एक बहुजन राजनीतिक नेता, और एक बौद्ध पुनरुत्थानवादी होने के साथ साथ, भारतीय संविधान के मुख्य वास्तुकार भी थे। उन्हें बाबासाहेब के नाम से भी जाना जाता है। इनका जन्म एक गरीब अस्पृश्य परिवार मे हुआ था। बाबासाहेब आंबेडकर ने अपना सारा जीवन हिंदू धर्म की चतुवर्ण प्रणाली, और भारतीय समाज में सर्वव्यापित जाति व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष में बिता दिया। हिंदू धर्म में मानव समाज को चार वर्णों में वर्गीकृत किया है। उन्हें बौद्ध महाशक्तियों के दलित आंदोलन को प्रारंभ करने का श्रेय भी जाता है। बाबासाहेब अम्बेडकर को भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया है, जो भारत का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है। कई सामाजिक और वित्तीय बाधाएं पार कर, आंबेडकर उन कुछ पहले अछूतों मे से एक बन गये जिन्होने भारत में कॉलेज की शिक्षा प्राप्त की। आंबेडकर ने कानून की उपाधि प्राप्त करने के साथ ही विधि, अर्थशास्त्र व राजनीतिक विज्ञान में अपने अध्ययन और अनुसंधान के कारण कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स से कई डॉक्टरेट डिग्रियां भी अर्जित कीं। आंबेडकर वापस अपने देश एक प्रसिद्ध विद्वान के रूप में लौट आए और इसके बाद कुछ साल तक उन्होंने वकालत का अभ्यास किया। इसके बाद उन्होंने कुछ पत्रिकाओं का प्रकाशन किया, जिनके द्वारा उन्होंने भारतीय अस्पृश्यों के राजनैतिक अधिकारों और सामाजिक स्वतंत्रता की वकालत की। डॉ. आंबेडकर को भारतीय बौद्ध भिक्कू ने बोधिसत्व की उपाधि प्रदान की है।
<<<<<<<< वृत्तचित्र-नवीं कक्षा पन्ने में>>>>>>>>>

Sunday, March 06, 2011

जल जीवन है!-एक सहायक सामग्री(कन्नूर से रविजी)


ये सामग्रियाँ ध्यान से पढ़ें,कृपया बताएँ आप की राय क्या है?
  1. टीचिंग मैनुअल.pdf
  2. निबंध.pdf
  3. पोस्टर.pdf
  4. Water.pdf
     
     

Sunday, February 27, 2011

Tuesday, February 15, 2011

पारस पत्थर

संस्कृत : "स्पर्श मणि" 

English: Philosopher's Stone

पारस पत्थर एक पहेली है। आज तक इस रहस्य को कोइ नहि जान पाया और जिसने जाना अब वह इस दुनिया मे नहि है परन्तु कह्ते है कि पारस कि खोज अब तक जारी है।
एटॉमिक संरचना की मानी जाये तो कोई ऐसा पारस पत्थर नहीं होता है जो लोहे को सोना बना दे। यह काले रंग का सुगन्धित पत्थर है तथा यह दुर्लभ व बहुमूल्य होता है।
पारस पत्थर के बारे मे यह मान्यता है कि लोहे को इस पत्थर से स्पर्श कराने पर लोहा सोना बन जाता है।
किंवदंती के अनुसार, 13 वीं सदी के वैज्ञानिक और दार्शनिक Albertus Manus ने पारस पत्थर की खोज की थी।

गुड़ (शक्कर)

Sa-indian-gud.jpgगुड़, ईख, ताड़ आदि के रस को गरम कर सुखाने से प्राप्त होने वाला ठोस पदार्थ । इसका रंग हलके पीले से लेकर गाढ़े भूरे तक हो सकता है। भूरा रंग कभी कभी काले रंग का भी आभास देता है। यह खाने में मीठा होता है। प्राकृतिक पदार्थों में सबसे अधिक मीठा कहा जा सकता है। अन्य वस्तुओं की मिठास की तुलना गुड़ से की जाती हैं। साधारणत: यह सूखा, ठोस पदार्थ होता हैं, पर वर्षा ऋतु जब हवा में नमी अधिक रहती है तब पानी को अवशोषित कर अर्धतरल सा हो जाता है। यह पानी में अत्यधिक विलेय होता है और इसमें उपस्थित अपद्रव्य, जैसे कोयले, पत्ते, ईख के छोटे टुकड़े आदि, सरलतर से अलग किए जा सकते हैं। अपद्रव्यों में कभी कभी मिट्टी का भी अंश रहता है, जिसके सूक्ष्म कणों को पूर्णत: अलग करना तो कठिन होता हैं किंतु बड़े बड़े का विलयन में नीचे बैठ जाते हैं तथा अलग किए जा सकते हैं। गरम करने पर यह पहले पिघलने सा लगता है और अंत में जलने के पूर्व अत्यधिक भूरा काला सा हो जाता है। 
उपयोग
गुड़ उपयोगी खाद्य पदार्थ माना जाता है। इसका उपयोग भारत में अति प्राचीन काल से होता आ रहा है। भारत की साधारण जनता इसका व्यापक रूप में उपयोग करती है तथा यह भोजन का एक आवश्यक व्यंजन है। इसमें कुछ ऐसे पौष्टिक तत्व विद्यमान रहते हैं जो चीनी में नहीं रहते। स्वच्छ चीनी में केवल चीनी ही रहती हैं, पर गुड़ में 90 प्रतिशत के लगभग ही चीनी रहती है। शेष में ग्लूकोज, खनिज पदार्थ, विटामिन आदि स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयोगी पदार्थ भी रहते हैं। आयुर्वेदिक दवाओं तथा भोज्य पदार्थों में विभिन्न रूपों में इसका उपयोग होता है।

बरगद

बरगद बहुवर्षीय विशाल वृक्ष है। यह एक स्थलीय द्विबीजपत्री एंव सपुष्पक वृक्ष है। इसका तना सीधा एंव कठोर होता है। इसकी शाखाओं से जड़े निकलकर हवा में लटकती हैं तथा बढ़ते हुए जमीन के अंदर घुस जाती हैं एंव स्तंभ बन जाती हैं। इन जड़ों को बरोह या प्राप जड़ कहते हैं। इसका फल छोटा गोलाकार एंव लाल रंग का होता है। इसके अन्दर बीज पाया जाता है। इसका बीज बहुत छोटा होता है किन्तु इसका पेड़ बहुत विशाल होता है। इसकी पत्ती चौड़ी, एंव लगभग अण्डाकार होती है। इसकी पत्ती, शाखाओं एंव कलिकाओं को तोड़ने से दूध जैसा रस निकलता है जिसे लेटेक्स कहा जाता है।

बेर(शब्द परिचय-हमारे गाँव की आखिरी बारिश)

बेर का फल
बेर भारत का बहुत ही प्राचीन एंव लोकप्रिय फल है । यह बिटामिन 'सी', 'सी' व 'बी' का अच्छा स्त्रोत है तथा इसमें कैल्शियम, लौह और शर्करा प्रचूर मात्रा में पाए जाते हैं । सस्ता एंव लोकप्रिय फल होने के कारण इसे गरीबों का मेवा भी कहा जाता है ।

Friday, February 11, 2011

Saturday, February 05, 2011

जल-संरक्षण के लिए समाज आगे आये(ज्ञानेंद्र/राज एक्सप्रेस)

सेव वाटर, सेव लाइफजल संकट देश ही नहीं, समूचे विश्व की गंभीर समस्या है। दुनिया के विशेषज्ञों की राय है कि वर्षा जल संरक्षण को बढावा देकर गिरते भू-जल स्तर को रोका जा सकता है। टिकाऊ विकास का यही आधार हो सकता है। इसमे दो राय नहीं कि जल संकट ही आने वाले समय की सबसे बडी चुनौती है, जिस पर गौर करना आज की सबसे बडी जरूरत है। वरना, स्थिति इतनी भयावह होगी कि उसका मुकाबला कर पाना असंभव होगा। लिहाजा, जल-प्रबंधन पर ध्यान दिया जाना बेहद जरूरी है।

Tuesday, January 25, 2011

नर्मदा बचाओ आन्दोलन पर एक फोटो फीचर

नर्मदा - मध्यभारत की जीवन रेखा-(साभार – नर्मदा समग्र)

 (नवीं कक्षा के हमारे गाँव की आखिरी बारिश केलिए अधिक सामग्री)
नर्मदानर्मदानर्मदा मध्य भारत के मध्य प्रदेश और गुजरात राज्य में बहने वाली एक प्रमुख नदी है। अमृतमयी पुण्य सलिला नर्मदा की गणना देश की प्रमुख नदियों में की जाती है। पवित्रता में इसका स्थान गंगा के तुरन्त बाद है कहा जो यह जाता है कि गंगा में स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है वह नर्मदा के दर्शन मात्र से ही प्राप्त हो जाता है।
यदि हम तर्क की नाव पर सवार हों तो नर्मदा मध्यप्रदेश के शहडोल जिल में अमरकंटक नामक स्थान से निकलने वाली एक बारहमासी नदी है जो पश्चिम की ओर बहती हुई गुजरात राज्य में जाकर खम्बात की खाडी में समुद्र में विलीन हो जाती है। सतपुडा और विंध्याचल की पर्वत श्रेणियों के संधि स्थल पर एक छोटे से कुंड के रूप में अवतरित इस नदी का स्वरूप यात्रा के अंत में समुद्र से मिलन के समय घाट लगभग 24 किलोमीटर हो जाता है, परन्तु यह भी सत्य है कि हमारे देश में नदियों को केवल बहते हुये जल के रूप में ही नहीं देखा जाता है। वे जीवनदायिनी मां के रूप में पूज्य होती है। नर्मदा में भी अपार आस्था समाई हुई है। इसे ’मइया‘ और देवी होने का गौरव प्राप्त है। पुरातन काल से ऋषि मुनियों की तपस्या स्थली रही नर्मदा आज भी धार्मिक अनुष्ठानों का गढ है। पूरे देश म यही एक मात्र ऐसी नदी है कि जिसकी परिक्रमा की जाती है। मन में अपार श्रद्धा लिये हुये सैकडों पदयात्री पैरों के छालों की परवाह किए बगैर 2600 कि.मी. की यात्रा में 3 वर्ष 3 महीने और 13 में पूरी करके अपने जीवन को धन्य मानते हैं।

नर्मदा के किनारे सैकडों तीर्थस्थल और मंदिर तो हैं ही साथ ही अनेक स्थानों पर इसका सदर्य देखते ही बनता है। असंख्या जडी बूटियों और वृक्षों के बीच से बहती हुई नर्मदा को मध्यप्रदेश की जीवन रेखा भी कहा जाता है। सैकडों छोटी-मोटी नदियों को अपने में समेटती हुई यह नदी कमी इठलाती हुई चलती है, कभी शांत बहती है तो कभी सहस्त्र धाराओं में विभाजित हो जाती है। संगमरमरी दूधिया चट्टानों को चीर कर इसको बहता देख दर्शक को अलौकिक सुख की प्राप्ति होती है। नर्मदा को निर्मल जल में स्नान से जो सुख प्राप्त होता है वह अवर्णनीय है। आराम देती है इसी से इसका नाम ’नर्मदा‘है और चुलबुली शरारती भी है और इसी कारण इसे ’रेवा‘ कहा गया है।

पुराणों में नर्मदा को शंकर जी की पुत्री कहा गया है, इसका प्रत्येक कंकर शंकर माना जाता है। जन मानस ने इसे ’मइया‘का गौरव दिया है। ’देवी‘ मानकर पूजा है। अपनी हजारों मन्नते पूरी की हैं। नर्मदा ने भी अनादि काल से अनगिनत रेखों को सींचा है। करोडों प्यासों की प्यास बुझाई है। आस्था के समुद्र में गोते लगाकर जिसने जो मांगा है उसे निराश नहीं किया है। पर आइए हम भी जरा सोचें कि हमने अपनी ’मां‘के लिए क्या किया है क्या हमारा कोई कर्तव्य नहीं है अपनी नर्मदा ’मइया‘ के प्रति मात्र पवित्रता करने से या स्तुतिगान से काम नहीं चलता। सेवा भाव से इसकी परिक्रमा को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए हम सबको जागरूक रहकर इसके संरक्षण के लिए प्रयास करना होगा ताकि आने वाली पीढियां भी लाभान्वित हो सके।

Friday, January 14, 2011

प्रेमचंद का गोदान(आभार-हिंदी कुंज)

प्रेमचंद का गोदान ई-बुक यहाँ से डौनलोड करें।

Sunday, January 09, 2011

शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय

Sharat Chandra Chatterji.jpgशरतचन्द्र चट्टोपाध्याय (१५ सितंबर, १८७६ - १६ जनवरी, १९३८ ) बांग्ला के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार थे। उनका जन्म हुगली जिले के देवानंदपुर में हुआ। वे अपने माता-पिता की नौ संतानों में से एक थे। अठारह साल की अवस्था में उन्होंने इंट्रेंस पास किया। इन्हीं दिनों उन्होंने "बासा" (घर) नाम से एक उपन्यास लिख डाला, पर यह रचना प्रकाशित नहीं हुई। रवींद्रनाथ ठाकुर और बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा। शरतचन्द्र ललित कला के छात्र थे लेकिन आर्थिक तंगी के चलते वह इस विषय की पढ़ाई नहीं कर सके। रोजगार के तलाश में शरतचन्द्र बर्मा गए और लोक निर्माण विभाग में क्लर्क के रूप में काम किया। कुछ समय बर्मा रहकर कलकत्ता लौटने के बाद उन्होंने गंभीरता के साथ लेखन शुरू कर दिया। बर्मा से लौटने के बाद उन्होंने अपना प्रसिद्ध उपन्यास श्रीकांत लिखना शुरू किया बर्मा में उनका संपर्क बंगचंद्र नामक एक व्यक्ति से हुआ जो था तो बड़ा विद्वान पर शराबी और उछृंखल था। यहीं से चरित्रहीन का बीज पड़ा, जिसमें मेस जीवन के वर्णन के साथ मेस की नौकरानी से प्रेम की कहानी है। जब वह एक बार बर्मा से कलकत्ता आए तो अपनी कुछ रचनाएँ कलकत्ते में एक मित्र के पास छोड़ गए। शरत को बिना बताए उनमें से एक रचना "बड़ी दीदी" का १९०७ में धारावाहिक प्रकाशन शुरु हो गया। दो एक किश्त निकलते ही लोगों में सनसनी फैल गई और वे कहने लगे कि शायद रवींद्रनाथ नाम बदलकर लिख रहे हैं। शरत को इसकी खबर साढ़े पाँच साल बाद मिली। कुछ भी हो ख्याति तो हो ही गई, फिर भी "चरित्रहीन" के छपने में बड़ी दिक्कत हुई। भारतवर्ष के संपादक कविवर द्विजेंद्रलाल राय ने इसे यह कहकर छापने से इन्कार कर दिया किया कि यह सदाचार के विरुद्ध है। विष्णु प्रभाकर द्वारा आवारा मसीहा शीर्षक रचित से उनका प्रामाणिक जीवन परिचय बहुत प्रसिद्ध है

प्रमुख कृतियाँ

शरत्चंद्र ने अनेक उपन्यास लिखे जिनमें पंडित मोशाय, बैकुंठेर बिल, मेज दीदी, दर्पचूर्ण, श्रीकांत, अरक्षणीया, निष्कृति, मामलार फल, गृहदाह, शेष प्रश्न, दत्ता, देवदास, बाम्हन की लड़की, विप्रदास, देना पावना आदि प्रमुख हैं। बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन को लेकर "पथेर दावी" उपन्यास लिखा गया। पहले यह "बंग वाणी" में धारावाहिक रूप से निकाला, फिर पुस्तकाकार छपा तो तीन हजार का संस्करण तीन महीने में समाप्त हो गया। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने इसे जब्त कर लिया। शरत के उपन्यासों के कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुए हैं। कहा जाता है कि उनके पुरुष पात्रों से उनकी नायिकाएँ अधिक बलिष्ठ हैं। शरत्चंद्र की जनप्रियता उनकी कलात्मक रचना और नपे तुले शब्दों या जीवन से ओतप्रोत घटनावलियों के कारण नहीं है बल्कि उनके उपन्यासों में नारी जिस प्रकार परंपरागत बंधनों से छटपटाती दृष्टिगोचर होती है, जिस प्रकार पुरुष और स्त्री के संबंधों को एक नए आधार पर स्थापित करने के लिए पक्ष प्रस्तुत किया गया है, उसी से शरत् को जनप्रियता मिली। उनकी रचना हृदय को बहुत अधिक स्पर्श करती है। पर शरत्साहित्य में हृदय के सारे तत्व होने पर भी उसमें समाज के संघर्ष, शोषण आदि पर कम प्रकाश पड़ता है। पल्ली समाज में समाज का चित्र कुछ कुछ सामने आता है। महेश आदि कुछ कहानियों में शोषण का प्रश्न उभरकर आता है। उनके कुछ उपन्यासों पर आधारित हिन्दी फिल्में भी कई बार बनी हैं।
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Thursday, December 23, 2010

Tuesday, December 21, 2010

ईष़व मेम्मोरियल

नवीं कक्षा के प्रश्न-केरल के दलित मुक्ति केलिए सहायक बने आन्दोलनों पर निबन्ध तैयार करें -केलिए सहायक सामग्री(भाग-4)


तिरुवितांरूर की आबादी मे 1/5 ईष़व जाति के थे। पर सरकारी कामों में उनको बहुत कम प्रतिनिधित्व मिलते थे।शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में ईष़व लोगों को भी महत्व मांगते हुए 13,176 लोगों से हतस्ताक्षरित एक बड़ी अर्जी 1896 सितंबर ३ को महाराजा के समक्ष पेश किया गया। यह अर्जी ईष़व मेम्मोरियल नाम से प्रसिद्ध है। इसके नेता डॉ.पल्पु थे।

मलयाली मेम्मोरियल

नवीं कक्षा के प्रश्न-केरल के दलित मुक्ति केलिए सहायक बने आन्दोलनों पर निबन्ध तैयार करें -केलिए सहायक सामग्री(भाग-5)


तिरुवितांकूर उच्च सरकारी पदों में तमिल ब्राह्मण लोग काम करते थे।"तिरुवितांकूर तिरुवितांकूर के लोगों केलिए" नारा लगाकर दस हजार लोगों से हतस्ताक्षरित एक बड़ी अर्जी महाराजा श्रीमूलम तिरुनाल के समक्ष, 1891 में पेश किया।यह है मलयाली मेम्मोरियल।इसके नेता जी.पी.पिल्ला और के.पी.शंकरमेनोन थे।

कल्पात्ती-शुचीन्द्रम सत्याग्रह

नवीं कक्षा के प्रश्न-केरल के दलित मुक्ति केलिए सहायक बने आन्दोलनों पर निबन्ध तैयार करें -केलिए सहायक सामग्री(भाग-3)


शुचीन्द्रम
कल्पात्ती
पालक्काडु जिले के कल्पात्ती शिवमंदिर रथोत्सव केलिए प्रसिद्ध है। पुराने ज़माने में मंदिर और उसके चारों ओर के रास्ते अवर्ण हिंदुओं केलिए निषिध थे।पर उल्लेख की बात यह है कि ईसाई और इस्लां धर्म के लोंगों को इसी रास्ते से चलने में कोई बाधा नहीं थी। गुरुवायूर सत्याग्रह से उत्तेजित अवर्ण जाति के युवकों ने रथोत्सव देखने केलिए मंदिर के बाहर के रास्ते में जबरदस्त प्रवेश किया।यह संघर्ष का कारण बन गया।कुछ लोग जाति और नाम बदलकर वही रास्ते से चलने लगे।इससे सवर्ण और ब्राह्णण लोग लज्जित हुए।१९२६ को डा.नायडू के नेतृत्व में एक सत्याग्रह शुरू किया।सत्याग्रह पराजय था। बाद में हाईकोर्ट में दी गई अर्जी पर आई आदेशानुसार शुचीन्द्रम मंदिर के रास्ते अवर्णों केलिए खुले।

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