वास्तव में इसके एक से अधिक कारण हो सकते हैं, मसलन पाठ्यपुस्तंकों की नीरसता,भाषा की पढ़ाई का परीक्षा या प्रकारान्तर से प्रश्नोत्तर केन्द्रित होना,सुनने-बोलने की उपेक्षा और इसकी तुलना में पढ़ने-लिखने पर ज्यादा जोर देना। और अध्यापक वर्ग की तरफ से बहुधा गिनाए जाने वाले कारणों में से एक बच्चे का नियमित शाला न आना आदि। लेकिन वास्तव में सच्चाई क्या है। इसकी पड़ताल की है चंदन यादव ने । उन्होंने प्राथमिक शाला की एक आम कक्षा का अवलोकन बहुत बारीकी से किया और उन बातों को दर्ज करने की कोशिश की जो शिक्षण को प्रभावित करती हैं। चंदन पिछले बीस से भी अधिक वर्षों से मध्यप्रदेश की शैक्षणिक संस्था एकलव्य में कार्यरत हैं। हाल के वर्षों में वे राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद की प्राथमिक शालाओं की हिन्दी भाषा की पाठ्यपुस्तकों को तैयार करने वाले लेखक दल में शामिल रहे हैं।
उनके अवलोकन को पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षक की लिंक पर क्लिक करें।
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