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Wednesday, July 13, 2016

ऊँट बनाम रेलगाड़ी - सहायक सामग्री 2

जैसलमेर किला
सोने का किला सत्यजित राय ने इस उपन्यास में अपने किशोर पाठकों को बंगाल से राजस्थान तक की यात्रा कराई है - कलकत्ता से जैसलमेर तक की यात्रा। यह उपन्यास एक ऐसे किशोर बालक मुकुल की कथा है जिसे पूर्व जन्म की बातें याद रहती हैं। साथ ही यह एक ऐसे जासूस की कथा है जिसे इस प्रकार के सारे रहस्य खोज निकालने का शौक है। अपनी इस विद्या में वह पूरी तरह निपुण है। ये जासूस फेलूदा हैं जिनका पूरा नाम है प्रदोष मित्तिर। मुकुल के पूर्व जन्म की बातों की खोज करने निकले फेलूदा। मुकुल के पूर्व जन्म में एक सोने का किला था, एक जगह कहीं गड़ा खजाना और उसके घर के पास ही कहीं लड़ाई चल रही थी। फेलूदा यह सब खोजते-खोजते कलकत्ता से जैसलमेर पहुँच गए। सोने का किला व गड़ा खजाना कइयों को ललचा गया था। गड़ा खजाना कौन खोज निकाले और कौन उस पर कब्जा करे, इस पर दूसरी दौड़ भी शुरू हो गई थी। फेलूदा जानते थे कि लोग उनका पीछा करेंगे। वे सतर्क थे। पीछा करनेवाले बदमाशों ने बड़ा जाल रचा, मगर फेलूदा मात खानेवाले नहीं थे। पक्के जासूस थे। सत्यजित राय का यह किशोर उपन्यास पाठकों को खूब मजे से राजस्थान के कई शहर किसनगढ़, बीकानेर, जोधपुर, पोकरण, रामदेवरा और फिर जैसलमेर दिखाता है। ‘सोने का किला’ उनके चार किशोर उपन्यासों में से एक है। इस उपन्यास के चित्र भी उन्होंने स्वयं बनाए हैं।

ऊँट बेनाम रेलगाड़ी संस्मरण में लाल मोहन 'गांगुली और जटायू' बताया है। ये दोनों एक है या नहीं - यह शंका सबकी है।  
हमने इस शंका के समाधान ढूँढ निकालने के लिए बहुत प्रयास किया । यू-ड्यूब से मिली वीडियो में (सोनार - कोल्ला) स्पष्ट रूप से लाल मोहन गांगुली फेलूदा से कहते हैं कि वे (गांगुली) जटायु नाम से लिखा करते हैं। उनका छद्म नाम है जटायु । (छद्म नाम माने തൂലികാ നാമം, उपनाम) तो गांगुली और जटायू एक ही व्यक्ति है। सोने का किला उपन्यास में यह स्पष्ट रूप से कहा है कि लाल मोहन गांगुली और तोप्से (तपेष) की सबसे बड़ी इच्छा यह थी कि मरुस्थल में ऊँट पर सवारी करना। 
आशा है पाठ-पुस्तिका सनिती के कोई मित्र इसपर  और स्पष्टीकरण देंगे।
(सोने का किला (उपन्यास - हिंदी) प्रकाशक-राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली। पेपर बैक –Pages 120 Price Rs. 100)
 

3 comments:

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