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Saturday, July 25, 2015

सुख-दुख कविता (व्याख्या भाग-१)

मैं नहीं चाहता चिर-सुख,
 मैं नहीं चाहता चिर-दुख,
 सुख दुख की खेल मिचौनी
खोले जीवन अपना मुख !
 सुख-दुख के मधुर मिलन से
यह जीवन हो परिपूरन;
 फिर घन में ओझल हो शशि,
 फिर शशि से ओझल हो घन !
कविवर पंत कहते हैं कि वे अपने जीवन में सदा सुख या दुख नहीं चाहते हैं। उन दोनों का मेल होना चाहिए। जैसे बच्चे आँख – मिचौनी खेल में कुछ समय आँखें बन्द करके फिर खोल देते हैं, उसी प्रकार जीवन के खेल में सुख या दुख कुछ समय आँख खोले और फिर बन्द करे। कहने का मतलब यह है कि मानव के जीवन में कुछ समय सुख है और कुछ समय दुख। तभी जीवन, खेल की ही तरह मज़ेदार होगा। नहीं तो जीना भी कठिन होगा।
जीवन में सुख और दुख का मीठा मिलाप होना चाहिए। जिस समय कुछ समय बादलों में अदृश्य रहने के बाद चन्द्रमा आकाश में फिर चांदनी फैलता है उसी प्रकार कुछ समय तक दुखों में अदृश्य रहने के बाद सुख को भी फिर जीवन में दर्शन देना चाहिए। बादलों में छिपे चाँद के दिखाई देते ही मन को बड़ा आनन्द मिलता है। वैसे ही कुछ काल तक दुख करने का अनुभव के बाद मानव को सुख मिलेगा तो उसे उस सुख से अत्यंत संतोष मिलता है। इसी से कवि चाहता है मानव जीवन में सुख-दुख बारी-बारी से आए तो अच्छा होगा।
                                                                          (जारी.......)

11 comments:

  1. जी बहुत उपयोगी है आपकी ओर से नये-नये प्रयास ..धन्यवाद...शुभ कामनाएँ ।

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  2. This comment has been removed by the author.

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  3. This comment has been removed by the author.

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  4. अच्छा प्रयास है..बहुत उपयोगी है...धन्यवाद..जारी रखें

    ***

    मैं नहीं चाहता चिर दुख,
    सुख दुख की खेल मिचौनी
    खोले जीवन अपना मुख!

    I don’t want eternal sadness,
    the game of happiness and sadness,
    opens the mouth of the life.

    सुख-दुख के मधुर मिलन से
    यह जीवन हो परिपूरण,
    फिर घन में ओझल हो शशि,
    फिर शशि से ओझल हो घन!

    from the pleasant union of happiness and sadness,
    the life is fulfilled,
    then the moon disappears in the clouds,
    and then the clouds disappears from the moon.

    जग पीड़ित है अति दुख से
    जग पीड़ित रे अति सुख से,
    मानव जग में बँट जाएँ
    दुख सुख से और सुख दुख से!

    The world suffers from much sadness,
    and the world suffers from much happiness,
    the men will be divided,
    from sadness happiness and from happiness sadness!

    अविरत दुख है उत्पीड़न,
    अविरत सुख भी उत्पीड़न,
    दुख-सुख की निशा-दिवा में,
    सोता-जगता जग-जीवन।

    constant sadness is a harassment,
    constant happiness is also a harassment,
    in the night and day of happiness-sadness,
    awaken and slept world of life.

    यह साँझ-उषा का आँगन,
    आलिंगन विरह-मिलन का,
    चिर हास-अश्रुमय आनन,
    रे इस मानव-जीवन का!

    this veranda of dusk-dawn,
    of embrace of separation and union,
    of face of eternal laughing-mourning,
    of this human-life!

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  5. സര്‍
    ഇതിന്റെ പി.ഡി.എഫ് ഡൗണ്‍ലോഡ് ചെയ്യാന്‍ സാധിക്കുമോ?

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  6. सराहनीय प्रस्तुति

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  7. panthji ki yah kavitha padne aur samajhne mein bahuth asaan hei,magar,kaksha mein sampreshaneey karne keliye dhodi dikkath lagi..chhathron mein uthsah jagane mein mushkil lagi.aadyanth ek hee thathv hei na..unka dhyan aakrshith karne keliye zyada koshish karna dha..Thiruvananthapuram hawayee jahaz mein huyee may days ghatana bathakar dukh sukh ka anokha milan vyath kiya dha..Blog mein diya gaya visleshan mereliye bahuth laabhdayak dhi.Dhanyavaad Sir..

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    1. गूगिल प्ले स्टोर से हांड रेटिंग इन्पुट डौन लोड कर के इस्तेमाल करें। हिंदी में आप आसानी से लिख सकते हैं।

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